मोदी ने ‘अबकी बार 400 पार’ की बात यूँ ही नहीं कही है, इसके पीछे पूरा चुनावी गणित है

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मोदी ने ‘अबकी बार 400 पार’ की बात यूँ ही नहीं कही है, इसके पीछे पूरा चुनावी गणित है

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा के समय विपक्ष की ओर से उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आत्मविश्वास एवं कर्मठता से भरकर कहा कि मैं ऐसे आँकड़ों में नहीं पड़ता लेकिन मैं देख रहा हूं कि देश का मिजाज भारतीय जनता पार्टी को 370 और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को 400 से ज्यादा सीटें पार करवाकर रहेगा। भाजपा इस बार चुनावों में 400 पार का नारा दे रही है। 2019 चुनावों में भाजपा ने 303 सीटें जीती थीं। निश्चित ही इतने बड़े आंकडे की घोषणा करने के पीछे नरेन्द्र मोदी की सकारात्मक सोच, विकास की राजनीति एवं राष्ट्र-विकास का संकल्प है, वहीं विपक्ष एवं कांग्रेस की नकारात्मक सोच, विरोध के लिए विरोध और विभाजनकारी रवैया उसके लगातार कमजोर होने के कारण हैं। प्रधानमंत्री ने सीटों का जो आकलन किया है, वह सिर्फ इस बात का संकेत है कि भाजपा अपने तीसरे कार्यकाल को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है। उन्होंने उन अटकलों पर भी विराम लगा दिया, जिनमें कहा जा रहा है कि इंडिया गठबंधन के रूप एकजुट हुआ विपक्ष उनको चुनौती देगा, क्योंकि विपक्षी एकजुटता बिखर चुकी है।

मोदी ने संसद के भीतर जब अपने चुनावी लक्ष्य की बात कही तो इसने भाजपा कार्यकर्ताओं को ऊर्जा से भर दिया, वहीं विपक्ष के सामने आत्मचिन्तन का अवसर प्रदत्त किया। कांग्रेस को 10 साल के दौरान अच्छा विपक्ष बनने का मौका मिला लेकिन इसमें वह पूरी तरह विफल रही। स्वयं तो विफल रही ही, बल्कि विपक्ष में भी कुछ होनहार लोगों को उभरने नहीं दिया। कांग्रेस की नकारात्मक एवं संकीर्ण राष्ट्र-विरोधी राजनीति को देश की जनता महसूस करने लगी है। कांग्रेस किस तरह नकारात्मक राजनीति का शिकार है यह लोकसभा में ही तब देखने को मिला जब सदन में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चैधरी ने बालाकोट में की गई एयर स्ट्राइक पर सवाल खड़े किए। ध्यान रहे कि ऐसे ही सवाल पाकिस्तान खड़े करता रहा है। आखिर उन्हें पाकिस्तान के स्वरों में स्वर मिलाने एवं उसको रास आने वाला बयान देने की जरूरत क्यों पड़ गई? ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, वह बार-बार कभी पाकिस्तान तो कभी चीन की तरफदारी करती रही है। मोदी विरोध के नाम पर वह राष्ट्र-विरोध पर उतरती रही है।

प्रधानमंत्री मोदी के इस विश्वास एवं दृढ़ता की अनेक वजहें हैं। एक बड़ी वजह हाल ही में साल 2023 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की शानदार जीत दर्ज करना भी है। विशेषकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का परिणाम तो कल्पना से भी बाहर था। दूसरी वजह, रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा ने लोगों में एक नए जोश का संचार किया है। अंतरिम बजट में ही जिस तरह से आने वाले कुछ महीनों को लेकर नीतियों का एलान किया गया है, वह संकेत है कि भाजपा अपनी जीत को लेकर काफी आश्वस्त है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी के नेतृत्व में ऐतिहासिक एवं चमत्कारी जीत की संभावनाओं की और भी वजहें हैं, जिनमें प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सुखद एवं उपलब्धिभरी प्रतिध्वनियां हैं, जैसे चांद एवं सूर्य पर विजय पताका फहरा देने के बाद धरती को स्वर्ग बनाने की मुहीम चल रही है, राष्ट्रीय जीवन में विकास की नयी गाथाएं लिखते हुए भारत को दुनिया की तीसरी आर्थिक महाशक्ति बनाने की ओर अग्रसर करना है। भारत अब विश्व-गुरु भी बनने की ओर गतिशील है। गत वर्ष 9 एवं 10 सितम्बर को जी-20 देशों का महासम्मेलन भारत में सफलतापूर्वक सम्पन्न होना भी भारत की विश्व स्तर पर मजबूत होने की स्थिति को दर्शा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में इस जिम्मेदारी को संभालने का अर्थ था भारत को सशक्त करने के साथ-साथ दुनिया को एक नया चिन्तन, नया आर्थिक धरातल, शांति एवं सह-जीवन की संभावनाओं को बल देना। नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा घोषित नई शिक्षा नीति की उपयोगिता एवं प्रासंगिकता धीरे-धीरे सामने आने लगी है एवं उसके उद्देश्यों की परते खुलने लगी है। भाजपा इसलिए भी आशान्वित है, क्योंकि जिस विपक्षी एकता की बात 2023 के मध्य से चल रही थी, उसमें दरारे पड़ती ही जा रही है। तमाम विपक्षी पार्टियां अपने-अपने ढंग से चुनाव लड़ने को तैयार हैं और कांग्रेस से उनकी खींचतान चल रही है। फिर, जहां-जहां भारतीय जनता पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती थीं, वहां पार्टी ने अपने अनवरत प्रयासों से खुद को मजबूत बना लिया है, फिर चाहे वह महाराष्ट्र हो या बिहार।

कांग्रेस एवं विपक्षी दलों के पास भाजपा एवं मोदी विरोध का कोई सशक्त धरातल एवं मुद्दें नहीं है। वैसे तो हर एक का जीवन अनेकों विरोधाभासों एवं विसंगतियों से भरा रहता है। लेकिन कांग्रेस का हर दिन कई विरोधाभासों के बीच बीत रहा है। कांग्रेस की उल्टी गिनतियां चल रही हैं। उसकी उल्टी गिनती तो लम्बी चलेगी। पर जनता के दिमाग में एक बात गहरे तक बैठी हुई है कि मोदी के नेतृत्व में सब कुछ बदल जाएगा, भारत सशक्त हो जायेगा, सब कुछ अच्छा हो जाएगा एवं सब कुछ श्रेष्ठ हो जाएगा। इसके विपरीत कांग्रेस की जनता पर पकड़ ढ़िली पड़ती जा रही है, उसके बयानों में कोई बुनियादी मुद्दें नहीं होते, बार-बार बेरोजगारी की चर्चा सुनने को मिलती है, जबकि 2014 से पहले इंफ्रास्ट्रक्चर का बजट केवल 12 लाख करोड़ के आसपास था। बीते 10 सालों में बजट बढ़कर 44 लाख करोड़ हो गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में कितनी नौकरियां पैदा हुई होंगी। आज युवाओं के लिए जितने नए अवसर बने हैं, ये पहले कभी नहीं बने। आज चारों तरफ स्टार्टअप्स की गूंज है, यूनिकॉर्न्स चर्चा में है। 2014 के पहले डिजिटल इकोनॉमी का साइज ना के बराबर था। आज भारत, दुनिया की अग्रणी डिजिटल इकोनॉमी है। लाखों युवा इससे जुड़े हैं और उनके सपनों को पंख लगे हैं। इसी तरह महिलाओं को सम्मानजनक जिन्दगी देने एवं उनके विकास को अग्रसर करने में मोदी सरकार ने व्यापक प्रयत्न किये हैं। एक संकल्प लाखों संकल्पों का उजाला बांट सकता है यदि दृढ़-संकल्प लेने का साहसिक प्रयत्न कोई शुरू करे। निश्चित ही अंधेरों, अवरोधों एवं अक्षमताओं से संघर्ष करने की एक सार्थक मुहिम प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2014 में शुरू हुई थी और उनका तीसरा कार्यकाल इन दृष्टियों से ऐतिहासिक होगा, यह आम जनता में पनप रहा विश्वास है।

मोदी ने अपने अब तक के कार्यकाल में जता दिया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति वाली सरकार अपने फैसलों से कैसे देश की दशा-दिशा बदल सकती है। कैसे राष्ट्र की सीमाओं को सुरक्षित रखते हुए पड़ोसी देशों को चेता सकती है, कैसे स्व-संस्कृति एवं मूल्यों को बल दिया जा सकता है। काशी हो या अयोध्या या ऐसे ही धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्रांति के परिदृश्य- ये अजूबे एवं चैंकाने वाले लगते हैं। अयोध्या से नरेन्द्र मोदी ने जो संदेश दिया है, उसे केवल चुनावी नफा-नुकसान के नजरिये से नहीं देखना चाहिए, बल्कि एक सशक्त होते राष्ट्र के नजरिये से देखा जाना चाहिए। उनका यह कहना खास मायने रखता है कि सदियों की गुलामी के चलते भारत को जिस हीनभावना से भर दिया गया था, आज का भारत उससे बाहर निकल रहा है। यह स्थिति आगामी लोकसभा चुनाव की जमीन बनेगी। स्पष्ट है, आम चुनाव में अब बहुत दिन शेष नहीं है, और दोनों मोर्चों की बिसात कमोबेश बिछ चुकी है। हालांकि, एक तरफ भाजपा जैसा सुगठित दल हैं, जिसके पास मोदी जैसा एक मजबूत नेतृत्व और स्पष्ट नजरिया है। जबकि उसे चुनौती देने वाले मोर्चे में फिलहाल काफी उथल-पुथल है। ऐसे में, यदि विरोधी खेमा नहीं चेता, तो प्रधानमंत्री ने जिन आंकड़ों के साथ जीत का दावा किया, वह यदि सच हो जाए, तो आश्चर्य नहीं होगा।

प्रधानमंत्री पिछले 10 वर्षों के दौरान हासिल अपनी सरकार की उपलब्धियां न गिनाकर, विपक्ष और खासकर कांग्रेस पर तंज के तीर बरसाए, इसके पीछे उनका स्पष्ट राजनीति मकसद रहा है। प्रधानमंत्री मोदी यह बखूबी जानते हैं कि अपने प्रतिपक्षी को कभी कमतर नहीं आंकना चाहिए, फिर अगले लोकसभा चुनाव के महासंग्राम में जिस पार्टी से उनका सबसे अधिक सीटों पर आमना-सामना होना है, उसकी कमियों, उसके अंतर्विरोधों, उसकी नाकामयाबियों एवं नकारात्मक सोच को देश की जनता के सामने रखना अधिक प्रभावी एवं मनोवैज्ञानिक तरीका है, उस पर दबाव बनाने एवं उसे कमजोर साबित करने का। मोदी इसमें माहिर है एवं राजनीतिक परिवक्वता से भरे हैं।

-ललित गर्ग

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं)

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