जिस रायबरेली ने गांधी परिवार को आंखों पर बिठा कर रखा उसे कांग्रेस ने बेगाना कर दिया

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जिस रायबरेली ने गांधी परिवार को आंखों पर बिठा कर रखा उसे कांग्रेस ने बेगाना कर दिया

राजनीति संभावनाओं का खेल है। कल क्या होगा इसको लेकर बड़े से बड़े राजनीतिक पंडित भी किसी तरह की भविष्यवाणी नहीं कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि नेताओं का चाल चरित्र और चेहरा अक्सर बदलता रहता है। नेता सहूलियत के हिसाब से अपने वोटरों और जनता से संबंध बनाते-बिगाड़ते हैं। इसकी सबसे ताजा मिसाल हैं सोनिया गांधी। बड़ी बेरुखी के साथ रायबरेली से सोनिया गांधी ने अपना मुंह मोड़ लिया है। जो कृत्य 2019 में उनके बेटे राहुल गाँधी ने अमेठी की जनता की साथ किया था, वही अब 2024 में सोनिया गांधी रायबरेली की जनता के साथ कर रही हैं। 2019 में अमेठी से चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी ने यहां (अमेठी) की जनता से नाता तोड़ लिया, जबकि अक्सर वह अमेठी के लिए ही जीने और मरने की कसमें खाया करते थे। 2019 में मिली हार के बाद राहुल ने अमेठी आना तो दूर, इसका नाम ही लेना छोड़ दिया है। यही काम अब सोनिया गांधी ने किया है। सोनिया गांधी स्वास्थ्य कारणों से रायबरेली से चुनाव नहीं लड़ रही हैं, इस बात का किसी को गिला नहीं है। गिला इस बात का है कि एक बार सोनिया गांधी यहां आकर अपने फैसले से रायबरेली की वोटरों को अवगत तो करा देतीं। आखिर कई लोकसभा चुनावों में यहां की जनता ने सोनिया गांधी के लिए बड़े-बड़े नेताओं को हार का स्वाद चखाने से परहेज नहीं किया था था। आज उन्हीं सोनिया गांधी ने रायबरेली की जनता को एकदम से बेगाना कर दिया। इसीलिए यह संभावना जताई जा रही है कि प्रियंका गांधी भी रायबरेली से चुनाव नहीं लड़ेंगी। यदि प्रियंका गांधी के यहाँ से चुनाव लड़ने की संभावना होती तो सोनिया गांधी रायबरेली की जनता के साथ कतई ऐसा व्यवहार नहीं करतीं। हालांकि अपनी गलती का अहसास होते ही सोनिया गांधी ने एक मार्मिक पत्र रायबरेली की जनता के नाम लिखा जरूर है, लेकिन इसमें स्पष्टता नहीं दिखाई देती है।

विपक्ष आरोप लगा रहा है कि सोनिया गांधी खराब स्वास्थ्य के कारण राजनीति से संन्यास ले लेतीं तो उनकी बात समझ में आती, लेकिन हकीकत यह है कि अबकी बार रायबरेली से चुनाव जीतने को लेकर सोनिया गांधी डरी हुई हैं। उन्हें लगता है कि वह रायबरेली से चुनाव हार जाएंगी, वरना वह पिछली कई बार की तरह इस बार भी यहां नामांकन करके चली जातीं और रायबरेली की जनता उन्हें जिता देती। यदि सोनिया गांधी समेत कोई यह समझता है कि राज्यसभा बीमार लोगों के लिए बनी है तो यह गलत उनकी गलत सोच है।

बहरहाल, रायबरेली की जनता को जिस तरह से सोनिया ने ठेंगा दिखाया है, उसके बाद यदि प्रियंका यहां से चुनाव लड़ती भी हैं तो उनके लिए चुनाव जीतना मुश्किल नहीं तो, आसान भी नहीं होगा। बात इतनी ही नहीं है, प्रियंका वाड्रा के लिए मुश्किल इसलिए भी खड़ी हो सकती है क्योंकि लंबे समय से वह रायबरेली से किनारा किए हुए हैं, जबकि वह 2019 तक अपनी मां के संसदीय क्षेत्र रायबरेली आया-जाया करती थीं।

गौरतलब है कि सोनिया गांधी ने 14 फरवरी 2024 को जब राज्यसभा के चुनाव के लिए राजस्थान के जयपुर पहुंच कर पर्चा दाखिल किया था। इसी से साफ हो गया है कि वे इस बार के लोकसभा चुनाव में नहीं उतरेंगी। रायबरेली कांग्रेस की परंपरागत सीट रही है। सोनिया गांधी 2019 में यहाँ से पांचवीं बार लोकसभा चुनाव जीती थीं। 2019 के चुनाव के दौरान सोनिया गांधी ने घोषणा की थी कि अगला लोकसभा चुनाव वे नहीं लड़ेंगी। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद वर्ष 1999 में पहली बार वे रायबरेली से चुनावी मैदान में उतरी और जीती थीं। सोनिया गांधी के रायबरेली सीट से हटने के बाद प्रियंका गांधी को लेकर दावा किया जा रहा था कि प्रियंका लोकसभा चुनाव में रायबरेली से उतरेंगी। हालांकि, अब इसको लेकर चर्चा पर विराम-सा लग गया है। कांग्रेस की तरफ से भी चोरी छिपे दावा किया जाने लगा है कि प्रियंका गांधी वाड्रा रायबरेली से 2024 के चुनाव में नहीं उतरेंगी।

गांधी परिवार और कांग्रेस को लगता है कि कहीं प्रियंका वाड्रा का भी हाल राहुल जैसा ना हो जाए। जैसे अमेठी की जनता ने राहुल को ठुकरा दिया था, वैसे ही रायबरेली की जनता प्रियंका को ठुकरा दे। दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी परंपरागत अमेठी सीट से उतरे थे। यहां से राहुल 2004 से चुनाव जीतते आ रहे थे। लेकिन, 2019 में उन्हें बीजेपी की स्मृति ईरानी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद से राहुल गांधी गिने-चुने मौकों पर ही अमेठी पहुंचे हैं। कांग्रेस इस बार विपक्षी गठबंधन के सहारे यूपी के चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में है जबकि जमीनी स्तर पर पार्टी का संगठन काफी कमजोर है। प्रियंका को यूपी चुनाव 2022 के दौरान प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था। ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ नारे के साथ चुनावी मैदान में उतरी प्रियंका ने यूपी की राजनीति में अपनी छाप छोड़ने की कोशिश की थी, लेकिन इसमें वह सफल नहीं हो पाई थीं। प्रियंका को इस चुनाव में कोई खास सफलता हाथ नहीं लगी थी। पार्टी को 2017 के विधानसभा चुनाव में दो सीटों पर जीत मिली थी। पार्टी के महासचिव पद को संभाल रहीं प्रियंका यूपी में पार्टी के वोट प्रतिशत को भी बढ़ाने में कामयाब नहीं हो पाईं। भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच हुए दो-तरफा मुकाबले में पार्टी को कोई खास सफलता नहीं मिल पाई थी।

रायबरेली में पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस लगातार कमजोर हुई है। यूपी चुनाव 2022 के दौरान रायबरेली में समाजवादी पार्टी की ताकत बढ़ती दिखी थी। वहीं, कांग्रेस से भाजपा में आई अदिति सिंह ने रायबरेली सदर सीट से जीत दर्ज की थी। कांग्रेसी किले में पहली बार भाजपा की जीत मिली। 2014 और 2019 के मोदी-योगी लहर में भी रायबरेली का किला फतह करने में भाजपा कामयाब नहीं हो पाई थी, लेकिन अब कांग्रेस की जमीन पर स्थिति ठीक नहीं है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से हुई समीक्षा में सोनिया गांधी के सीट छोड़ने के बाद पार्टी की इस सीट पर जीत को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसीलिए प्रियंका को यहां से नहीं लड़ाया जा रहा है। प्रियंका के करीबी भी दावा कर रहे हैं कि प्रियंका गांधी स्वयं भी रायबरेली से चुनावी मैदान में नहीं उतरना चाहती हैं। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में गांधी परिवार के लिए कोई सेफ सीट नहीं बची है। इसी के चलते करीब 70 सालों के बाद यूपी कांग्रेस विहीन हो जाएगी। जबकि कभी कांग्रेस यूपी का मजबूत गढ़ हुआ करता था। यूपी के बल पर वह केंद्र तक में अपनी सरकार बनती थी। यूपी ने कांग्रेस को कई प्रधानमंत्री दिए थे, लेकिन अब यह सब बातें अतीत के पन्नों में सिमट गई हैं।

-अजय कुमार

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